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बारिश ने बिगाड़ा मैच? समझिए DLS मेथड — टारगेट कैसे तय होता है

October 1, 2026 · Shah
बारिश ने बिगाड़ा मैच? समझिए DLS मेथड — टारगेट कैसे तय होता है

क्रिकेट में बारिश सबसे बड़ा दुश्मन मानी जाती है। मैच रोमांचक मोड़ पर हो और अचानक बादल घिर आएं — ऐसे में हारी-बाज़ी पलटने का फैसला कौन करता है? जवाब है DLS मेथड, यानी डकवर्थ-लुईस-स्टर्न पद्धति। आइए सरल भाषा में समझते हैं कि यह काम कैसे करता है।

DLS से पहले क्या होता था?

आज DLS को हम सामान्य मानते हैं, लेकिन एक दौर था जब बारिश से प्रभावित मैचों का फैसला बेहद अन्यायपूर्ण तरीकों से होता था। सबसे कुख्यात उदाहरण 1992 वर्ल्ड कप का सेमीफाइनल है — इंग्लैंड बनाम दक्षिण अफ्रीका। बारिश के बाद पुराने नियम से दक्षिण अफ्रीका को आखिरी 1 गेंद पर 22 रन चाहिए थे, जबकि बारिश से पहले समीकरण 13 गेंदों पर 22 रन का था। यह नाइंसाफी इतनी बड़ी थी कि क्रिकेट जगत को एक वैज्ञानिक समाधान की ज़रूरत महसूस हुई।

DLS मेथड क्या है?

DLS मेथड को दो सांख्यिकीविदों — फ्रैंक डकवर्थ और टोनी लुईस — ने बनाया। पहली बार इसका इस्तेमाल जनवरी 1997 में ज़िम्बाब्वे-इंग्लैंड वनडे में हुआ, और ICC ने 1999 में इसे आधिकारिक रूप से अपना लिया। 2014 में स्टीवन स्टर्न इसके संरक्षक बने, तब से इसे डकवर्थ-लुईस-स्टर्न (DLS) कहा जाता है।

इस पद्धति का मूल सिद्धांत बेहद तार्किक है: बल्लेबाज़ी टीम के पास दो संसाधन (resources) होते हैं — बचे हुए ओवर और बचे हुए विकेट। सिर्फ ओवर गिनना काफी नहीं, क्योंकि 10 विकेट हाथ में होने पर टीम आखिरी ओवरों में कहीं तेज़ी से रन बना सकती है, जबकि 8 विकेट गंवाने वाली टीम संभलकर खेलेगी। DLS इन्हीं दोनों संसाधनों को एक तालिका (resource table) के ज़रिए प्रतिशत में बदल देता है।

टारगेट कैसे तय होता है? — सरल उदाहरण

मान लीजिए पहली टीम ने 50 ओवर में 300 रन बनाए (उसके संसाधन = 100%)। दूसरी टीम की पारी में बारिश आई और उसके सिर्फ 70% संसाधन बचे।

  • पार स्कोर = 300 × (70/100) = 210
  • टारगेट = पार स्कोर + 1 = 211 रन

यानी दूसरी टीम को जीत के लिए 211 रन बनाने होंगे। अगर मैच यहीं रुक जाए और दूसरी टीम ने 211 या ज़्यादा रन बना लिए हैं, तो वह DLS से विजेता घोषित होगी; कम रन पर पहली टीम जीतेगी।

एक और स्थिति भी होती है — जब बारिश से पहली टीम की पारी बाधित हो। तब दूसरी टीम के संसाधन पहली से ज़्यादा हो सकते हैं, और टारगेट सामान्य से बढ़ जाता है। इसके लिए औसत स्कोर (G50, जो मौजूदा संस्करण में 245 माना गया है) का इस्तेमाल होता है।

DLS में बड़े बदलाव

क्रिकेट बदल रहा है — आज टीमें 350+ स्कोर आम बना रही हैं। इसी को ध्यान में रखकर 2014 के अपडेट में DLS की गणना को आधुनिक स्कोरिंग रेट के हिसाब से ढाला गया। यही वजह है कि अब बड़े टोटल वाले मैचों में DLS टारगेट पहले से ज़्यादा न्यायसंगत लगते हैं। टी20 क्रिकेट में भी DLS लागू होता है।

एक अहम नियम: DLS से नतीजा तभी निकलता है जब वनडे में दोनों टीमें कम से कम 20-20 ओवर और टी20 में 5-5 ओवर खेल चुकी हों। इससे कम ओवर पर मैच रद्द (no result) घोषित होता है।

आलोचनाएं और मशहूर किस्से

DLS परफेक्ट नहीं है — यह खुद इसके निर्माता भी मानते हैं। सबसे मशहूर किस्सा 2003 वर्ल्ड कप का है, जब श्रीलंका के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका को आखिरी गेंद पर पार स्कोर की गलतफहमी हुई और मार्क बाउचर ने गेंद रोक दी, यह सोचकर कि वे आगे हैं। असल में स्कोर बराबर था — मैच टाई हुआ और दक्षिण अफ्रीका टूर्नामेंट से बाहर हो गई। यह DLS की नहीं, बल्कि पार स्कोर को गलत पढ़ने की चूक थी, लेकिन इसने पूरी दुनिया को DLS समझने पर मजबूर कर दिया।

निष्कर्ष

DLS मेथड बारिश से बिगड़े मैचों का सबसे न्यायसंगत समाधान है — यह सिर्फ बचे ओवर नहीं, बल्कि बचे विकेटों की अहमियत भी गिनता है। अगली बार जब स्क्रीन पर “DLS पार स्कोर” दिखे, तो आप जानेंगे कि उसके पीछे सिर्फ गणित नहीं, दशकों का क्रिकेट-इतिहास और एक बड़ी नाइंसाफी से सीखा गया सबक है।